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(१) ईश्वर की स्वयं के बारे में जानकारी कि वह ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा भी है तथा संपूर्ण ब्रह्माण्ड भी। | (१) ईश्वर की स्वयं के बारे में जानकारी कि वह ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा भी है तथा संपूर्ण ब्रह्माण्ड भी। | ||
(२) मनुष्य की स्वयं के बारे में जागरूकता, जैसे वह रहता है, व्यवहार करता है, और स्वयं को ब्रह्मांडीय आत्म-जागरूकता और उच्च चेतना के क्षेत्र में चारों ओर से घिरा हुआ पाता है। | (२) मनुष्य की स्वयं के बारे में जागरूकता, जैसे वह रहता है, व्यवहार करता है, और स्वयं को ब्रह्मांडीय आत्म-जागरूकता और उच्च चेतना के क्षेत्र में चारों ओर से घिरा हुआ पाता है। वह मनुष्यआत्म-जागरूकता में स्वयं को आत्म-साक्षात्कार में सक्षम पाता है। उसमे ब्रह्मांडीय | ||
चक्रों (cycles) मे निपुणता, ब्रह्मांडीय आयामों में ईश्वर के एक अंश के रूप में जागरूकता, ब्रह्मांडीय चेतना के माध्यम से दीक्षा की प्राप्ति के गुण उसके साक्षी हैं। | |||
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