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शिष्यता के मार्ग पर चलने के लिए स्वयं को उपलब्ध साधन बनाना प्रधान उपायों में से एक है। शिष्य वह अनुशासित व्यक्ति है जो इस बात के लिए सदैव तैयार रहता है। | शिष्यता के मार्ग पर चलने के लिए स्वयं को उपलब्ध साधन बनाना प्रधान उपायों में से एक है। शिष्य वह अनुशासित व्यक्ति है जो इस बात के लिए सदैव तैयार रहता है। | ||
[[Special:MyLanguage/Kuthumi|कुथुमी]] कहते हैं | [[Special:MyLanguage/Kuthumi|कुथुमी]] कहते हैं: | ||
<blockquote>शिष्य वह होता है जो ईश्वर के अनुशासन का अभ्यास करता है, वह अपने बाहरी व्यक्तित्व और वैचारिक ढांचे को नियंत्रण और अनुशासन में रखता है, वह अपने [[Special:MyLanguage/I AM THAT I AM|ईश्वरीय स्वरुप]] के प्रति जागरूक रहता है। जो लोग अपने जीवन में शिष्यत्व के मार्ग को अपनाते हैं और प्रकाश की सेवा में सलंग्न रहते हैं वे भाग्यशाली हैं। ये सदा प्रकाश को प्राथमिकता देते हैं इसलिए एक दिन इन्हें प्रकाश पहले स्थान - भगवान की इच्छा के केंद्र - में रखेगा। तब शिष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा, क्योंकि गुरु के लिए कुछ भी कठिन नहीं है।<ref>{{CCL}}, अध्याय ३०।</ref></blockquote> | <blockquote>शिष्य वह होता है जो ईश्वर के अनुशासन का अभ्यास करता है, वह अपने बाहरी व्यक्तित्व और वैचारिक ढांचे को नियंत्रण और अनुशासन में रखता है, वह अपने [[Special:MyLanguage/I AM THAT I AM|ईश्वरीय स्वरुप]] के प्रति जागरूक रहता है। जो लोग अपने जीवन में शिष्यत्व के मार्ग को अपनाते हैं और प्रकाश की सेवा में सलंग्न रहते हैं वे भाग्यशाली हैं। ये सदा प्रकाश को प्राथमिकता देते हैं इसलिए एक दिन इन्हें प्रकाश पहले स्थान - भगवान की इच्छा के केंद्र - में रखेगा। तब शिष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा, क्योंकि गुरु के लिए कुछ भी कठिन नहीं है।<ref>{{CCL}}, अध्याय ३०।</ref></blockquote> | ||
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