एल मोर्या

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Painting of El Morya wearing a yellow turban and a blue robe
दिव्यगुरु एल मोर्या

एल मोर्या श्वेत महासंघ (Great White Brotherhood) के दार्जिलिंग समिति के प्रमुख हैं। ये पहली किरण के चौहान और भारत के दार्जीलिंग शहर में स्थित आकाशीय टेम्पल ऑफ़ गुडविल के प्रधान हैं। एल मोरया द समिट लाइटहाउस के संस्थापक हैं और सन्देश वाहक मार्क एल प्रोफेट और एलिजाबेथ क्लेयर प्रोफेट के गुरु और शिक्षक भी हैं।

एल मोर्या साहस, निश्चितता, शक्ति, स्पष्टवादिता, आत्मनिर्भरता, विश्वसनीयता, विश्वास और पहल के ईश्वरीय गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये पिता - राजनेता, कार्यकारी, शासक - के सिद्धांतों के गुण हैं। इन्होनें कई अवतारों के माध्यम से इन आवश्यक गुणों को बहुत कुशलता से उजागर किया है - एक जन्म में उन्होंने ताज पहना है और कई राज्यों पर बुद्धिमानी से अच्छी तरह से शासन किया है। उन्होंने कभी तानाशाह बनकर शासन नहीं किया, कभी यह नहीं चाहा की प्रजा उसकी इच्छा के अधीन हो। वह अपनी प्रजा को ईश्वर की पवित्र इच्छा के प्रति प्रबुद्ध आज्ञाकारिता के लिए प्रेरित करते हैं।

एल मोर्या के अवतार

तीन देवदूतों का मनोरंजन करते हुए अब्राहम (उत्पत्ति १८:९-१५ ), जन विक्टर्स

अपने कई अवतारों में एल मोर्या सक्रिय रूप से प्रकाश की सेवा में लगे हुए थे। अपने कई अवतारों में एल मोर्या ने "दिव्य विद्युत शक्तियों' के साथ प्रयोग करना सीखा जिससे मनुष्य की आध्यात्मिक शक्तियों के बारे में पता चला - उदाहरण स्वरूप इनाक के पुत्र के रूप में इन्होनें आध्यात्मिक उत्थान के बारे में जाना - "भगवान ने इनाक को मरने नहीं दिया, वे उन्हें अपने साथ ले गए थे"; वे उन सिद्ध पुरुषों में से एक थे जिन्होंने उर कसदीम (Ur of the Chaldees) की प्राचीन भूमि में प्रकाश के उच्च आयामों में प्रवेश किया था; पर्शिया (ईरान) के निवासी के रूप में ये एक ईश्वर - अहुरा माज़दा - की आराधना करते थे। तत्पश्चात वे फ़ोहैट का रचनात्मक उपयोग करने में निपुण हो गए। फ़ोहैट ब्रह्मांडीय चेतना की रहस्यमय विद्युत शक्ति (शांत या सक्रिय) है, यह वह प्रेरक महत्वपूर्ण शक्ति है जो दैवीय आदेश द्वारा कार्रवाई में बुलाए जाने पर, ब्रह्मांड, आकाशगंगा या सौर मंडल के विकास, यहां तक ​​कि एक इंसान को अपने मिशन के प्रारम्भ से अंत तक पूरा करने के लिए आगे बढाती है।

अब्राहम

मुख्य लेख: अब्राहम

एल मोर्या (सी. २१०० बी.सी.) में अब्राहम के रूप में जन्मे थे, जो पहले हिब्रू आचार्य थे जो इजराइल की बारह जनजातियों के जन्मदाता थे। यहूदी, ईसाई और इस्लाम ये तीनो धर्म अपनी उत्पत्ति अब्राहम से ही मानते हैं। एक समय था जब विद्वानों ने व्यापक रूप से यह मान लिया था कि अब्राहम या तो एक काल्पनिक व्यक्ति थे या कोई खानाबदोश या यहूदी परन्तु प्रथम विश्व युद्ध के बाद की पुरातात्विक खोजों ने अब्राहम की तस्वीर की पुष्टि की है जो बाइबिल में ही दी गई है।

ईश्वर के बुलावे पर अब्राहम ने मेसोपोटामिया की संस्कृति और पंथ को त्याग सुमेरिया के शहर उर से प्रस्थान किया। गौर करने की बात यह है कि उस समय सुमेरियन सभ्यता अपनी चरम सीमा पर थी। ईश्वर ने उसे अपने दिखाए हुए देश की यात्रा करने के लिए कहा। द बुक ऑफ़ जेनेसिस में उनका वर्णन एक समृद्ध व्यक्ति के रूप में किया गया है जो समुदायों का प्रमुख है और अपनी एक निजी सेना रखता है। पड़ोसी समुदायों की प्रमुख उसे एक शक्तिशाली राजकुमार के रूप में पहचानते हैं

अब्राहम ईश्वर में विश्वास रखने वाले व्यक्ति का आदर्श हैं।उनके विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा तब हुई जब भगवान ने उन्हें अपने बेटे आइजैक का बलिदान देने के लिए कहा। अब्राहम ने कई वर्षों तक आइजैक के जन्म का इंतजार किया था - आइजैक का जन्म ईश्वर के वरदान स्वरुप हुआ था। इसके बावजूद अब्राहम ने ईश्वर की आज्ञा का पालन किया। जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को मारने के लिए चाकू उठाया, भगवान के एक दूत ने उन्हें रुकने के लिए कहा - तब अब्राहम ने अपने पुत्र के स्थान पर एक भेड़ का अर्पण किया।

अब्राहम के ईश्वर के प्रति गहन विश्वास के कारण, ईसाई और इस्लाम दोनों के धर्मग्रंथों में उन्हें ईश्वर के मित्र (कुरान की अरबी भाषा में "एल खलील") के रूप में वर्णित किया गया है। पुराने जेरूसलम शहर में जाफ़ा गेट पर कुरान का एक अंश अंकित है - अल्लाह के अलावा कोई भगवान नहीं है, और अब्राहम उनका प्रिय है।

मेल्चियोर

मुख्य लेख: मेल्चियोर

मेल्चियोर पूर्व के तीन बुद्धिमान पुरुषों में से एक थे। मेल्चियोर के अपने जन्म में उन्होंने उस तारे का अनुसरण किया जिसने उनके वंश के सर्वोत्तम जन्म की पूर्वसूचना दी थी जो उनके आध्यात्मिक वंशजों के लिए ईश्वर के सभी वादों को पूरा करेगा। मेल्चियोर कहते हैं:

बहुत समय पहले, मैं कुथुमी और ज्वल कुल के साथ पूर्व के तीन बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक था। तब मैं ऊंट पर सवार होकर स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करने आया था। मैं बहुत अच्छी तरह से जानता था कि मेरा जीवन ईश्वर के प्रति समर्पण के लिए है। इसी कारण उनके पुत्र को सद्भावना का प्रतीक मानकर, मैं प्रेम-भरे दिल से उनके पास गया और ईश्वर के रास्ते पर चलने की प्रतिज्ञा ली। ये प्रतिज्ञा लेते वक्त मैंने ईश्वर की उस इच्छा का स्मरण किया जो देवदूतों के सेवकों ने "ग्लोरी टू गॉड इन द हाईएस्ट" नामका स्तुति गीत में प्रकट की थी।[1]

राजा आर्थर

मुख्य लेख: राजा आर्थर

पांचवीं शताब्दी में आर्थर के रूप में, कैमलॉट केवेक के एक रहस्य विद्यालय के गुरु के रूप मैं, उन्होंने आंतरिक शिक्षाओं की रक्षा की। उन्होंने गोलमेज के शूरवीरों और दरबार की महिलाओं को होली ग्रेल की खोज करने और दीक्षा के माध्यम से आत्मा के रहस्यों को प्राप्त करने के लिए बुलाया। जब वे राजा थे इंग्लैंड में एकता, व्यवस्था और शांति कायम थी। सेंट जर्मेन राजा आर्थर और उनके शूरवीरों की ग्रेल खोज के रहस्यवादी सलाहकार मर्लिन के रूप में अवतरित हुए थे।

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मध्ययुगीन पुस्तक, बुक ऑफ आवर्स, में दर्शायी गयी थॉमस बेकेट की शहादत (सी.१३९०)

थॉमस बेकेट

मुख्य लेख: थॉमस बेकेट

थॉमस बेकेट (१११८-११७०) के रूप में वह इंग्लैंड के लॉर्ड चांसलर थे और हेनरी द्वितीय के अच्छे दोस्त और सलाहकार थे। कैंटरबरी के आर्चबिशप बनने के बाद उन्होंने चांसलर पद से इस्तीफा दे दिया हालांकि राजा ऐसा कतई नहीं चाहते थे। थॉमस बेकेट ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे यह भांप गए थे कि आर्कबिशप के रूप में उनके कार्य राजा की इच्छा के विपरीत होंगे।

आर्चबिशप बनने के बाद बेकेट ने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं और कूटनीतिक कुशलता का बहुत अच्छा प्रयोग किया। उन्होंने पोप के पद का उसी प्रबलता के साथ समर्थन किया जितना वह पहले राजा के पद का किया करते थे। यही नहीं, उन्होंने चर्च की संपत्ति के गैरकानूनी उपयोग और अन्य उल्लंघनों के लिए राजदरबारियों और रईसों का खुलेआम बहिष्कार किया। राजा द्वारा बंदी बनाये जाने की आशंका होने पर बेकेट इंग्लैंड छोड़कर फ्रांस में चले गए। फ्रांस में छह वर्ष तक रहने के बाद उनकी इंग्लैंड के राजा के साथ कुछ हद तक सुलह हो गयी और वे वापिस इंग्लैंड आ गए। परन्तु यह सुलह ज़्यादा समय नहीं टिकी और उन दोनों में एक नए सिरे से झगडे शुरू हो गए।

२९ दिसंबर ११७० को कैंटरबरी के प्रधान गिरजा घर में अदालत के चार शूरवीरों ने बेकेट की बेरहमी से हत्या कर दी - उन शूरवीरों ने राजा की इस टिप्पणी को अक्षरश: मान लिया था कि वह "इस अशांत पुजारी" से छुटकारा पाना चाहते हैं। अंत समय में बेकेट ने उन शूरवीरों से कहा: "यदि इंग्लैंड में सभी तलवारें भी मेरे सिर पर तनी हों, तो भी मैं भगवान या पोप को धोखा नहीं दूंगा।" मृत्यु के कुछ वर्षों बाद पाँच सौ से अधिक उपचारात्मक चमत्कारों का श्रेय उन्हें दिया गया, जिसके तीन साल बाद उन्हें संत की उपाधि से सम्मानित किया गया।

Thomas More wearing the chain of office of chancellor
होल्बिन द यंगर द्वारा १५२७ में बनाया गया सर थॉमस मोर का चित्र

थॉमस मोर

मुख्य लेख: थॉमस मोर

मोर्या को "बहुमुखी प्रतिभा वाले व् विभिन्न भूमिकायें निभाने में सक्षम" सर थॉमस मोर (१४७८-१५३५), के नाम से भी जाना जाता था। उनकी ईश्वर के प्रति गहरी आस्था थी और एक समय ऐसा भी था जब वे अपनी आजीविका के लिए किसी धार्मिक कार्य को अपनाना चाहते थे - आत्म-अनुशासन का परीक्षण करने के लिए उन्होंने चार वर्षों से अधिक समय तक असाधारण तपस्या भी की। परन्तु बाद में उन्होंने विवाह लिया - आगे चलकर उनकी पत्नी और चार बच्चे ही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी और एकमात्र सुख का साधन साबित हुए। उनका घर चेल्सी में था जहाँ वे अपने पूरे परिवार - पत्नी, बच्चे और ग्यारह पोते-पोतियों - समेत रहते थे।

अंततः मोर का घर, जिसे वे अक्सर "छोटा आदर्शलोक" कहते थे, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बन गया, जिसकी तुलना इरास्मस ने "प्लेटो की अकादमी" से की थी। यह सद्भावना से पूर्ण घर था जिसमें उस समय के राजा और अनेक विद्वान लोग सलाह-मश्वरे के लिये आते थे। यहीं पर मोर ने यूटोपिया नामक पुस्तक लिखी थी जिसमें उन्होंने अंग्रेजी जीवन की अल्पज्ञता और अंग्रेजी कानून की बुराइयों का विनोदपूर्वक खुलासा किया है ।

१५२९ में सर थॉमस मोर को हेनरी अष्टम द्वारा इंग्लैंड के लॉर्ड चांसलर और ग्रेट सील के रक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। उनकी उपलब्धियां के लिए उन्हें कई बार समान्नित भी किया गया था हालांकि वे इस बात के इच्छुक नहीं थे। वह अपनी तत्परता, कार्यकुशलता और समतापूर्ण न्याय के लिए जाने जाते थे। वह गरीब और असहाय लोगों की सहायता करने के उद्देश्य से प्रतिदिन लंदन की गलियों में घूमते थे।

सर थॉमस अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित थे तथा अपने सभी कार्यों को उत्साह से करते थे। जब वहां के राजा हेनरी को सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी कैथरीन (जो मूलतः ऐरोगोन की निवासी थीं) से सम्बन्धविच्छेद कर लिया और अन्न बोलेंन से विवाह का निश्चय किया, तब मोर ने राजा का साथ नहीं दिया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि पोप तलाक का समर्थन नहीं करते थे, तथा तलाक को गिरिजाघर की मान्यता प्राप्त नहीं थी।

१५३२ में अपने करियर के चरम पर उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और चेल्सी चले गए जहां लूथर के विद्रोह के पाखंडों से चिंतित होकर उन्होंने कैथोलिक विश्वास की रक्षा में अपना लेखन जारी रखा। वहां, दोस्तों और कार्यालय के बिना, मोर और उनका परिवार अत्यंत गरीबी में रहे। बहरहाल राजा हेनरी के प्रति उनकी सार्वजनिक अस्वीकृति के कारण राजा का बहुत अपमान हुआ था इसलिए राजा ने अपनी छवि को बहाल करने के लिए मोर को बदनाम किया।

जब उन्होंने सर्वोच्चता की शपथ (Oath of Supremacy) लेने से इनकार किया तो मोर को टॉवर ऑफ लंदन में कैद कर दिया गया - शपथ लेते का अर्थ होता कि वे पोप की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर राजा हेनरी को अंग्रेजी चर्च का प्रमुख मान रहें हैं। पंद्रह महीने बाद, झूठे सबूतों के आधार पर उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया गया। ६ जुलाई १५३५ को टॉवर हिल पर उनका सिर काट दिया गया। मोर ने हमेशा खुद को "राजा का अच्छा सेवक, लेकिन भगवान का पहला सेवक" बताया था। इसके लगभग ४०० साल बाद १९३५ में मोर को संत घोषित किया गया।

थॉमस मोर अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और हाज़िरजवाबी के लिए जाने जाते थे। लेखक एंथनी केनी का मानना ​​है कि मोर का विश्वास था कोई भी अच्छा आदमी प्रतिकूल परिस्थितियों और संकट का सामना चुपचाप इस्तीफा देकर या सिद्धांत के उत्कृष्ट बयान के साथ नहीं, बल्कि एक परिहास के साथ करता है। मोर के सबसे हालिया जीवनीकारों में से एक के अनुसार, 'जब मोर सबसे ज़्यादा नाखुश होते थे, तभो वह सबसे ज़्यादा मज़ाक भी करते थे।'

वकील, न्यायाधीश, राजनेता, विद्वान व्यक्ति, लेखक, कवि, किसान, और ग्राम्य जीवन के प्रेमी, तपस्वी, पति और पिता, महिलाओं की शिक्षा के सर्वोच्च समर्थक, मानवतावादी और संत, थॉमस मोर अंग्रेजी पुनर्जागरण के लोगों में अग्रणी स्थान पर थे।

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अकबर धार्मिक सभा के आयोजक थे

अकबर

मुख्य लेख: अकबर महान

मोर्या का अगला जन्म अकबर महान (१५४२-१६०५) के रूप में हुआ, जो भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक और सबसे एक महान शासक थे। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ सभी भेदभाव को समाप्त कर दिया और मुसलमानों के समकक्ष अधिकार देते हुए हिन्दुओं को सरकार में भी शामिल किया। उनकी नीतियों को अपने समय की सबसे प्रबुद्ध नीतियों में से एक माना जाता था।

थॉमस मूर

मुख्य लेख: थॉमस मूर

मोर्या आयरिश कवि (१७७९-१८५२ ) थॉमस मूर भी थे - इन्होनें कई गीत लिखे। उनका सबसे प्रसिद्द गीत है - "बिलीव मी इफ ऑल देज़ एंडियरिंग यंग चार्म्स"। यह गीत सर्वोच्च अच्छाई के प्रतिनिधि के रूप में, ईश्वर की इच्छा के प्रति उनके गहन प्रेम और इस संसार के हर बोझ से अछूती आत्मा की शुभ्र, निष्कलंक छवि को दर्शाता है।

एल मोर्या खान

पृथ्वी पर अपने अंतिम जन्म में, एल मोर्या का जन्म भारत में एक राजपूत राजकुमार के रूप में हुआ था जो बाद में हिमालय के पहाड़ों पर भ्रमण करने वाले भिक्षु बन गया। मास्टर एम. के रूप में उन्होंने कुथुमी और ज्वल कुल के साथ मिलकर, हेलेना पी. ब्लावात्स्की के लेखन के माध्यम से मानव जाति को कानून और ईश्वरीय पदक्रम के कामकाज से परिचित कराने का प्रयास किया। एच. पी. ब्लावात्स्की और सेंट जर्मेन के साथ मिलकर उन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की।

१८९८ में मोर्या का आध्यात्मिक उत्थान हो गया परन्तु आज भी सद्भावना की लौ और अवतरित शिष्यों के माध्यम से पृथ्वी पर ईश्वर-शासन के लिए वह अपना महान कार्य जारी रखे हुए हैं।

उनके नाम का अर्थ

एल मोर्या ने कहा है कि उसका नाम माराया है. माँ का तात्पर्य ईश्वर के मातृ रूप से है। रा का अर्थ पिता है, ईश्वर का पितृ रूप - प्राचीन मिस्रवासी पिता के लिए रा शब्द का प्रयोग करते थे। आज हम रा को किरण कहते हैं - सूर्य से आने वाली किरण। या ज्वलंत योड अथवा पवित्र आत्मा की शक्ति है, जो दिव्य चेतना की त्रिमूर्ति का तीसरा भाग है। प्राचीन हिब्रू में एल का तात्पर्य एलोहिम या ईश्वर से है।

तो हम ऐसा कह सकते हैं कि मोरया एल, या माराया एल नाम नामों के पीछे एक ऐसा व्यक्ति है जिसने जानबूझकर यह नाम चुना ताकि वह भगवान की महिमा को दिखा सके। और फिर इन्हें एक नया नाम दिया गया - एक ऐसा नाम जो भगवान की स्तुति करता है -जिसका इस्तेमाल उन्होंने किया।

श्री मगरा और कई अन्य महान लोगों के नामों का विश्लेषण करने पर हमें यह पता चलता है कि नामों की पहचान हमेशा ईश्वरत्व के साथ की गई है - व्यक्ति तो स्वयं ईश्वरत्व में लीन हो गए हैं।

एल मोर्या का वर्तमान मिशन

दार्जिलिंग समिति के प्रमुख

हिमालय की तलहटी में बसे भारत देश के शहर दार्जिलिंग में आकाशीय स्तर पर टेम्पल ऑफ़ गुडविल है, एल मोर्या यहाँ के प्रमुख हैं। यह आश्रय स्थल एक ऐसा बलक्षेत्र है जहाँ से सौर पदक्रम पृथ्वी पर ब्रह्मांडीय ऊर्जा भेजते हैं। दार्जिलिंग समिति तथा ब्रदर्स ऑफ डायमंड हार्ट के सदस्यों के साथ मिलकर एल मोर्या ईश्वर की इच्छा को संगठित, विकसित, निर्देशित और कार्यान्वित करके मानव जाति की सहायता करते हैं।

एल मोर्या कहते हैं:

ब्रदरहुड के दार्जिलिंग रिट्रीट से मेरी सेवा जारी रहती है। यहां मैं भगवान की इच्छा के अनुरूप चलने वाले अन्य भाइयों के साथ परामर्श करता हूं, और हम उन सब को ऊर्जा भेजते हैं जो पृथ्वी पर विभिन्न राष्ट्रों की सरकारों में शिक्षक, वैज्ञानिक और संगीतकार के रूप में कार्य करते हैं, और उन लोगों को भी जो ईश्वर की इच्छा के अनुसार शासन करते हैं। ईश्वर की इच्छा मनुष्यों के प्रत्येक कार्य में लागू की जाती है, हर एक कार्य की रूपरेखा ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही बनाई जाती है। यह ही प्रत्येक कार्य का आधार है। आपके शरीर में हड्डियों का ढांचा ईश्वर की इच्छा ही है, यह ही भौतिक ऊर्जा है, यह ही आकाशीय अग्नि। आपके ह्रदय में प्रज्वलित प्रेम और सद्भावना भी ईश्वर की इच्छा है।[2]

ईश्वर का हीरे जैसा चमकता दिमाग ही हर एक कार्य का मूल है। लोक सेवकों, विश्व और समुदाय के नेताओं और सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्तियों को नींद के दौरान सूक्ष्म शरीर के माध्यम से तथा उनके विभिन्न जन्मों के बीच के समय में ईश्वर की इच्छा के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है - उन्हें बताया जाता है की किस तरह वे धर्म, व्यवसाय, और शिक्षा के क्षेत्र में ईश्वर की इच्छा के अनुसार काम कर सकते हैं। दिव्यगुरु तथा पृथ्वी पर रहने वाले गुरु और उनके शिष्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं और उनके समाधान के बारे में चर्चा करने के लिए मोर्या के आश्रय स्थल में अक्सर मिलते हैं। यहीं पर दिव्यगुरु एल मोर्या ने १९६३ में राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के निधन के बाद उनका स्वागत किया था।

समिट लाइटहाउस की स्थापना

१९२० और १९३० के दशक के दौरान दिव्यगुरु एल मोर्या ने निकोलस रोएरिच और हेलेना रोएरिच के साथ काम किया, जिन्होंने कई प्रकाशित कार्यों में अपने लेखन को प्रस्तुत किया।

एल मोर्या ने १९५८ में वाशिंगटन डी.सी. में द समिट लाइटहाउस की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सन्देश वाहकों -मार्क और एलिजाबेथ प्रोफेट - को दी गई दिव्यागुरुओं की शिक्षाओं को प्रकाशित करना था। अपने विभिन्न अवतारों में धरती पर ईश्वर की इच्छा के अनुसार शासन स्थापित करने के उनके प्रयासों का यह एक भाग है।

सन्देश वाहकों का आना दार्जिलिंग समिति द्वारा किये गए कई प्रयासों के बाद हुआ है: १९६१ में संत जर्मेन द्वारा ब्रह्मांडीय कानून में वर्गीकृत निर्देश स्थापित करने के लिए कीपर्स ऑफ़ द फ्लेम फ्रटर्निटी की स्थापना; मदर मैरी, जीसस और कुथुमी द्वारा मारिया मोंटेसरी के सिद्धांतों और दिव्यगुरुओं की शिक्षाओं पर आधारित मोंटेसरी इंटरनेशनल की स्थापना; समिट यूनिवर्सिटी की स्थापना; और चर्च यूनिवर्सल एंड ट्राईमफेंट पर ईश्वर की मुहर लगाना, ग्रेट व्हाइट ब्रदरहुड के सभी दिव्यगुरूओं, आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त की हुई आत्माओं, और दीक्षा के मार्ग पर चलनेवाले सभी व्यक्तियों का विद्यालय।

कुथुमी और ज्वल कुल के साथ किया गया काम

६ जनवरी १९९८ को एल मोर्या ने हमें बताया कि तीन बुद्धिमान पुरुष, एल मोरया, कुथुमी और ज्वल कुल, हमें आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग पर चलने तरीका सिखाएंगे और वे उन सभी की सहायता करेंगे जो इस जीवन में आधायत्मिक उत्थान के इच्छुक हैं। ये दिव्यगुरु हमें कर्मों को संतुलित करने में मदद करेंगे, और वे तब तक रहेंगे जब तक कि कुछ प्रमुख जीवात्माओं का आध्यात्मिक उत्थान नहीं हो जाता।

एल मोर्या, कुथुमी और ज्वल कुल हृदय की त्रिदेव ज्योत के तीन पंखों का प्रतिनिधित्व करते हैं - नीला पंख एल मोर्या का है; पीला पंख कुथुमी का है और गुलाबी पंख ज्वल कुल का है। ये तीनों हमारी त्रिदेव ज्योत को अपनी त्रिदेव ज्योत के साथ संतुलित करने के लिए आते हैं। यदि आप इन तीनो की शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं तो आप अपनी आत्मिक क्षमता को पहचान पाते हैं तथा ईश्वरत्व तक पहुँचते हैं।

मुझे-नहीं-भूलना

एल मोर्या की शिष्यता

१९९५ में मोर्या ने बताया कि उनका चेला बनने के लिए क्या करना पड़ता है:

जो लोग वास्तव में मेरे साथ एक होने की इच्छा रखते हैं उनके व्यवहार में स्थिरता होना अत्यंत आवश्यक है। इस अटल स्थिरता से ही उन्हें ईश्वर की इच्छा की प्रतीक नीली लौ की पवित्र अग्नि प्रतिपल प्राप्त होती है। आपको ईश्वर की डांट सुनने के लिए, और स्वयं में सुधार लाने के लिए हर वक्त तैयार रहना होगा। आपको प्रतिदिन डिक्रीस करनी होगी, आपकी डिक्रीस का आवेग ही आपकी आध्यात्मिक उन्नति तय करता है। आप नीली किरण की कोई भी डिक्री कर सकते हैं चाहे वह मेरे लिए हो, सूर्य के लिए हो, या फिर हिमालय के लिए; वैवस्तव के लिए या फिर महादेवदूत माइकल के लिए।

आप आश्वस्त रहिये कि जब आप स्वयं को नीली किरण से पूरी तरह से संतृप्त कर लेते हैं और अपने मन की हर उस अप्रत्याशित स्थिति के प्रति सचेत रखते जो आपको ईश्वर के रास्ते भटका सकती है, तो मैं आपका समर्थक बन जाता हूँ। और एक बार जब मैं किसी शिष्य का समर्थक बन जाता हूँ तो अंत तक उसका साथ नहीं छोड़ता। तो आप इस बात को समझिये कि मैं चेला बनाने के कार्य को हल्के में नहीं लेता।

आपमें से कई लोग शिष्य बनने के रास्ते पर चल रहे हैं। लेकिन मुझे आपको कई वर्षों तक, कभी-कभी जीवन भर तक, परखना होगा। जब मुझे स्वयं सर्वशक्तिमान ईश्वर से संकेत मिलेगा तब ही मैं किसी को अपना शिष्य बना सकता हूं।

आप इस बात को समझिए कि स्वयं को भगवान की इच्छा का भक्त बनाना अच्छी बात है। ऐसा होने पर आप भक्त के रूप में आगे बढ़ते जाएंगे और आपके चार निचले शरीरों और आपके जीवन की परिधि के चारों ओर नीले रंग के कई घेरे बन जाएंगे। जब आप अपने आप को जीवन की कई विषम, अस्थिर एवं विनाशकारी परिस्थितियों में भी सही रास्ते पर चलते रहते हैं तो यह सिद्ध हो जाता है कि आप एक उत्तम शिष्य हैं। तब हम दार्जीलिंग समिति में आपका स्वागत करते हैं।

जी हाँ, ये एक बेहद खास मौका है और हर कोई अपने आप को इस लायक बना सकता है। मैं इसके बारे में बात कर रहा हूं क्योंकि मैंने पृथ्वी का सर्वेक्षण किया है और मैंने इस कक्षा में दिए गए उपदेशों को सुना है। मैं समझता हूं कि अगर इन शिक्षाओं के अस्तित्व के बारे में लोगों को पता होगा तो बहुत सारे ऐसे लोग होंगे जो इन शिक्षाओं को खोजेंगे।

चूँकि मैं इस गतिविधि और इस पथ के लिए लाखों जीवात्माओं को प्रायोजित करने वाला हूँ, मुझे यह सुनिश्चित करना होगा कि पृथ्वी पर जिन लोगों ने इस समुदाय का गठन किया है वे सच्चे शिष्य हैं।[3]

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एल कैपिटन, योसेमाइट नेशनल पार्क

एल मोर्या के आश्रय स्थल

मुख्य लेख: टेम्पल ऑफ़ गुडविल

ग्रेट व्हाइट ब्रदरहुड की दार्जिलिंग समिति के प्रमुख के रूप में, मोर्या दार्जिलिंग में अपने आश्रय स्थल, रिट्रीट ऑफ़ ऑफ गॉड्स विल में गोलमेज बैठकों की अध्यक्षता करते हैं। यहाँ दुनिया के राजनेताओं की आत्माएं और ईश्वर की इच्छा में निष्ठा रखने वाले पुरुष और महिलाएं इनके अधीन अध्ययन करने के लिए एकत्रित होते हैं।

मोर्या का दूसरा आश्रय स्थल एल कैपिटन, योसेमाइट वैली, कैलिफोर्निया में है

सर एडवर्ड एल्गर ने अपनी संगीत रचना "पोम्प एंड सर्कमस्टेंस" में एल मोर्या का मूलराग प्रस्तुत किया है - यह राग उनकी इलेक्ट्रॉनिक उपस्थिति की आवृत्तियों को आकर्षित करता है। नीले गुलाब और फोरगट-मी-नॉट एल मोर्या के फूल हैं, और उनकी सुगंध चंदन की है।

इसे भी देखिये

चौहान

एल मोर्या का आश्रम

एल मोर्या का प्रकाश रुपी उपहार

अधिक जानकारी के लिए

El Morya, The Chela and the Path: Keys to Soul Mastery in the Aquarian Age

Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, Lords of the Seven Rays

स्रोत

Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Masters and Their Retreats

El Morya, The Chela and the Path: Keys to Soul Mastery in the Aquarian Age

Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, Saint Germain On Alchemy: Formulas for Self-Transformation.

मार्क एल प्रोफेट, ६ अगस्त १९७२

  1. एल मोर्या, जुलाई ३, १९६५.
  2. एल मोर्या, “टू अवेकन अमेरिका टू ऐ वाइटल पर्पस,” १६ अप्रैल १९७६, Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, Lords of the Seven Rays, पुस्तक नंबर २ के दूसरे अध्याय से.
  3. एल मोर्या, "क्लीन हाउस !”Pearls of Wisdom, vol. ३८, no. २६.