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Psychic/hi: Difference between revisions

Created page with "मनुष्य को मोक्ष पाने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि स्वर्ग भीतर ही है। और जो आपके भीतर है, वही हमारा राज्य है।<ref>भगवान मैत्रेय, "ॐ," {{POWref|२७|१५|, ८ अप्रैल, १९८४}}</ref> </blockquote>"
(Created page with "आपको यह समझना चाहिए कि आपके लिए सबसे सुरक्षित और सबसे अच्छा [पाठ्यक्रम] वही है जो दिव्यगुरुओं ने निर्देशित किया है। वही आपको सिखाता है कि आपको दिव्यगुरूओं की कही बातों का अध्ययन एवं...")
(Created page with "मनुष्य को मोक्ष पाने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि स्वर्ग भीतर ही है। और जो आपके भीतर है, वही हमारा राज्य है।<ref>भगवान मैत्रेय, "ॐ," {{POWref|२७|१५|, ८ अप्रैल, १९८४}}</ref> </blockquote>")
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आपको यह समझना चाहिए कि आपके लिए सबसे सुरक्षित और सबसे अच्छा [पाठ्यक्रम] वही है जो दिव्यगुरुओं ने निर्देशित किया है। वही आपको सिखाता है कि आपको दिव्यगुरूओं की कही बातों का अध्ययन एवं अनुसरण, और उनसे प्रार्थना कैसे करनी चाहिए; कैसे उन्हें बुलाना चाहिए, उनसे [[Special:MyLanguage/initiation|दीक्षा]] प्राप्त करनी चाहिए ताकि आप वास्तव में एक दिव्य व्यक्ति बन पाएं। इस तरह से आप [[Special:MyLanguage/Spoken Word|शब्द]] को बोलने का महत्व समझेंगे, अपने अंदर की ईश्वरीय चेतना को जागृत कर अपने अंतर्मन की [[Special:MyLanguage/resurrection flame|पुनरुत्थान की लौ]] को महसूस कर पाएंगे।
आपको यह समझना चाहिए कि आपके लिए सबसे सुरक्षित और सबसे अच्छा [पाठ्यक्रम] वही है जो दिव्यगुरुओं ने निर्देशित किया है। वही आपको सिखाता है कि आपको दिव्यगुरूओं की कही बातों का अध्ययन एवं अनुसरण, और उनसे प्रार्थना कैसे करनी चाहिए; कैसे उन्हें बुलाना चाहिए, उनसे [[Special:MyLanguage/initiation|दीक्षा]] प्राप्त करनी चाहिए ताकि आप वास्तव में एक दिव्य व्यक्ति बन पाएं। इस तरह से आप [[Special:MyLanguage/Spoken Word|शब्द]] को बोलने का महत्व समझेंगे, अपने अंदर की ईश्वरीय चेतना को जागृत कर अपने अंतर्मन की [[Special:MyLanguage/resurrection flame|पुनरुत्थान की लौ]] को महसूस कर पाएंगे।


Men do not have to go outside themselves to find salvation, for the kingdom of heaven is within you. And that kingdom that is within you is our kingdom.<ref>Lord Maitreya, “AUM,{{POWref|27|15|, April 8, 1984}}</ref>
मनुष्य को मोक्ष पाने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि स्वर्ग भीतर ही है। और जो आपके भीतर है, वही हमारा राज्य है।<ref>भगवान मैत्रेय, "ॐ," {{POWref|२७|१५|, ८ अप्रैल, १९८४}}</ref>
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