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Lemuria/hi: Difference between revisions

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== स्वर्ग का गुम हो जाना ==
== स्वर्ग का गुम हो जाना ==


जो जीवात्माएं मातृभूमि के साथ नष्ट हो गईं, वे पुनः धरती पर अवतरित हुईं। उनका स्वर्ग खो गया था, सो वे उस रेत पर भटकते रहीं जिस पर भगवान ने स्वयं लिखा था  "तुम्हारे लिए ही यह भूमि शापित है..."<ref>जेन। ३:१७.</ref> उन जीवात्माओं को ना तो अपने पूर्व जन्म के बारे में याद था और ना ही पूर्व जन्म से उनका कोई संबंध था इसलिए उनका अस्तित्व पूरी तरह से प्राचीन था। ईश्वर के नियमों की अवज्ञा करने के कारण उन्होंने अपनी आत्म-निपुणता, प्रभुत्व का अधिकार और [[Special:MyLanguage/I AM Presence|ईश्वरीय स्वरुप]] के बारे में अपना ज्ञान भी खो दिया। उनकी [[Special:MyLanguage/threefold flame|त्रिगुणात्मक लौ]] अत्यंत छोटी हो गई थी और उनके शरीर के चक्रों की रोशनी बुझ गई थी। इसके परिणामस्वरूप [[Special:MyLanguage/Elohim|एलोहीम]] ने उनके चक्रों का कार्यभार अपने ऊपर ले लिया और उनके [[Special:MyLanguage/four lower bodies|चार निचले शरीरों]] में रौशनी का वितरण करने लगे।
जो जीवात्माएं मातृभूमि के साथ नष्ट हो गईं, वे पुनः धरती पर अवतरित हुईं। उनका स्वर्ग खो गया था, सो वे उस रेत पर भटकते रहीं जिस पर भगवान ने स्वयं लिखा था  "तुम्हारे लिए ही यह भूमि शापित है..."<ref>जेन। ३:१७.</ref> उन जीवात्माओं को ना तो अपने पूर्व जन्म के बारे में याद था और ना ही पूर्व जन्म से उनका कोई संबंध था इसलिए उनका अस्तित्व पूरी तरह से प्राचीन था। ईश्वर के नियमों की अवज्ञा करने के कारण उन्होंने अपनी आत्म-निपुणता, प्रभुत्व का अधिकार और [[Special:MyLanguage/I AM Presence|ईश्वरीय स्वरुप]] (I AM Presence) के बारे में अपना ज्ञान भी खो दिया। उनकी [[Special:MyLanguage/threefold flame|त्रिज्योति लौ]] (threefold flame) अत्यंत छोटी हो गई थी और उनके शरीर के चक्रों की रोशनी बुझ गई थी। इसके परिणामस्वरूप [[Special:MyLanguage/Elohim|एलोहीम]] (Elohim) ने उनके चक्रों का कार्यभार अपने ऊपर ले लिया और उनके [[Special:MyLanguage/four lower bodies|चार निचले शरीरों]] (four lower bodies) में रौशनी का वितरण करने लगे।


चूँकि मनुष्य में अब आत्मा की छवि नहीं थी वह एक प्रजाति ''(होमो सेपियन्स/ homo sapiens)'' बन कर रह गया। भगवान् ने मनुष्य की ईश्वर-क्षमता को ब्रह्मांडीय इतिहास के एक हजार दिनों के लिए बंद कर दिया, इसलिए मनुष्य अब अन्य जानवरों की तरह एक जानवर ही था। और फिर यहाँ से शुरू हुई मनुष्य के विकास की एक कठिन यात्रा जो तब समाप्त होगी जब मनुष्य आत्मिक प्रवीणता द्वारा अपने पूर्ण ईश्वर-स्वरुप को प्राप्त कर लेगा। और वो युग होगा सतयुग।
चूँकि मनुष्य में अब आत्मा की छवि नहीं थी वह एक प्रजाति ''(होमो सेपियन्स/ homo sapiens)'' बन कर रह गया। भगवान् ने मनुष्य की ईश्वर-क्षमता को ब्रह्मांडीय इतिहास के एक हजार दिनों के लिए बंद कर दिया, इसलिए मनुष्य अब अन्य जानवरों की तरह एक जानवर ही था। और फिर यहाँ से शुरू हुई मनुष्य के विकास की एक कठिन यात्रा जो तब समाप्त होगी जब मनुष्य आत्मिक प्रवीणता द्वारा अपने पूर्ण ईश्वर-स्वरुप को प्राप्त कर लेगा। और वो युग होगा सतयुग।
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