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Lord of the World/hi: Difference between revisions

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== विश्व के विभिन्न प्रतिनिधि ==
== विश्व के विभिन्न प्रतिनिधि ==


गौतम बुद्ध शम्बाला की अध्यक्षता करते हैं । वहां का भौतिक आश्रयस्थल अब आकाशीय स्तर पर है जिसे विभिन्न  कारणो से पृथ्वी लोक से उठा लिया गया था ।  युगों-युगों से श्वेत महासंघ के ज्ञात और अज्ञात दूतों ने शम्बाला के बुद्ध और ज्वाला के हितु  भौतिक सप्तक में संतुलन बनाए रखा है। इस प्रकार, ईसा मसीह ने ब्रह्मांडीय मैत्रेय बुद्ध  के अभिषिक्त दूत के रूप में, अपने पवित्र हृदय के माध्यम से मैत्रेय बुद्ध, गौतम बुद्ध और सनत कुमार के परमपिता रूपी प्रकाश को पृथ्वी के असंख्य लोगों के हृदय में स्थापित करने का द्वार थे।  
गौतम बुद्ध शम्बाला की अध्यक्षता करते हैं । वहां का भौतिक आश्रयस्थल अब आकाशीय स्तर पर है जिसे विभिन्न  कारणो से पृथ्वी लोक से उठा लिया गया था ।  युगों-युगों से श्वेत महासंघ के ज्ञात और अज्ञात दूतों ने शम्बाला के बुद्ध और ज्वाला के हितु  भौतिक सप्तक में संतुलन बनाए रखा है। इस प्रकार, ईसा मसीह ने ब्रह्मांडीय मैत्रेय बुद्ध  के अभिषिक्त दूत के रूप में, अपने पवित्र हृदय के माध्यम से मैत्रेय बुद्ध, गौतम बुद्ध और सनत कुमार के पितृत्व रूपी प्रकाश को पृथ्वी के असंख्य लोगों के हृदय में स्थापित करने का द्वार थे।  


ईसा मसीह ने ब्रह्मांडीय कानून के अनुसार भौतिक स्तर पर अपने पद को परिभाषित किया है।  वे कहते हैं, "जब तक मैं दुनिया में हूँ, तब तक मेरे द्वारा कहा गया शब्द - ईश्वरीय स्वरुप - ही दुनिया का प्रकाश है।" <ref>जॉन ९:५।</ref> अपने अनाहत चक्र (heart chakra) में ईश्वरीय स्वरुप के प्रकाश की उपस्थिति की वजह से ही जीसस पृथ्वी ग्रह के कर्मों, "दुनिया के पापों" को अपने ऊपर लेने में समर्थ हो पाए। उन्होंने ऐसा इसलिए लिया ताकि जीवात्माएं उनके मार्ग का अनुसरण तब तक करें जब तक कि वे भी अपने शरीर-रूपी मंदिर में ईश्वर के पुत्र के प्रकाश को धारण न कर लें।  
ईसा मसीह ने ब्रह्मांडीय कानून के अनुसार भौतिक स्तर पर अपने पद को परिभाषित किया है।  वे कहते हैं, "जब तक मैं दुनिया में हूँ, तब तक मेरे द्वारा कहा गया शब्द - ईश्वरीय स्वरुप - ही दुनिया का प्रकाश है।" <ref>जॉन ९:५।</ref> अपने अनाहत चक्र (heart chakra) में ईश्वरीय स्वरुप के प्रकाश की उपस्थिति की वजह से ही जीसस पृथ्वी ग्रह के कर्मों, "दुनिया के पापों" को अपने ऊपर लेने में समर्थ हो पाए। उन्होंने ऐसा इसलिए लिया ताकि जीवात्माएं उनके मार्ग का अनुसरण तब तक करें जब तक कि वे भी अपने शरीर-रूपी मंदिर में ईश्वर के पुत्र के प्रकाश को धारण न कर लें।  
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