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इस प्रकार मंदिरों का प्रकाश बुझ गया था, और जिस उद्देश्य से ईश्वर ने मनुष्य को सृजित किया था — ईश्वर का जीता जागता रूप बनना — वह अब पूरा नहीं हो रहा था। सभी मनुष्य आत्मिक रूप से मर गए थे, वे एक खली पात्र, एक खोखला खोल बन गए थे। पृथ्वी पर कहीं भी [[Special:MyLanguage/mystery school|रहस्य वाद]] का कोई विद्यालय नहीं था — न कोई शिष्य था , न ही कोई गुरु, और न ही ईश्वरत्व के मार्ग पर चलने वाला कोई साधक। | इस प्रकार मंदिरों का प्रकाश बुझ गया था, और जिस उद्देश्य से ईश्वर ने मनुष्य को सृजित किया था — ईश्वर का जीता जागता रूप बनना — वह अब पूरा नहीं हो रहा था। सभी मनुष्य आत्मिक रूप से मर गए थे, वे एक खली पात्र, एक खोखला खोल बन गए थे। पृथ्वी पर कहीं भी [[Special:MyLanguage/mystery school|रहस्य वाद]] का कोई विद्यालय नहीं था — न कोई शिष्य था , न ही कोई गुरु, और न ही ईश्वरत्व के मार्ग पर चलने वाला कोई साधक। | ||
वो न्याय की घड़ी थी - सम्पूर्ण पदक्रमों के सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान परमेश्वर ने सर्वसम्मिति से बानी राय को सभी के सामने प्रस्तुत किया - पृथ्वी और वहां रहनेवाले सभी जीवों को नष्ट कर दिया जाए, उन्हें पवित्र अग्नि की मोमबत्ती की तरह प्रज्वलित किया जाए; सभी अनुपयुक्त ऊर्जाओं को ध्रुवीकरण के लिए पुनः [[Special:MyLanguage/Great Central Sun|महान केंद्रीय सूर्य]] में लौटा दिया जाए। इससे दुरुपयोग की गई ऊर्जा का अल्फा और ओमेगा के प्रकाश से पुनः नवीनीकरण हो जाएगा, तथा सृजन कार्य के लिए इस ऊर्जा का पुनः उपयोग किया जा सकता है। | |||
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